गरीबी (एक विचित्र कथा)
गरीब इस धरती का सबसे पुराना प्राणी है.वैसे गरीब भी देखने में एकदम आदमी टाइप ही लगता है. उसकी भी दो टांगें, दो हाथ, गर्दन, सिर तथा पेट होता है. परंतु कुछ ऐसा चमत्कार है कि इसका पूरा शरीर और व्यक्तित्व अंततः बस पेट में सिमट कर रह जाता है. वरना इसका सिर भी होता है गो कि वह पेट के चक्कर में इतना झुका रहता है कि दिखता ही नहीं. इसकी गर्दन भी होती है गो कि वह अमीरी की मुट्ठी में यूं जकड़ी होती है कि पता ही नहीं चलती. इसकी दो टांगें भी होती हैं. इन पर वह जीवन भर दौड़ता हुआ गरीबी से परे भागने की कोशिश करता रहता है पर जा नहीं पाता क्योंकि गरीबी हजारों पैरों से उसका पीछा करके उसे दबोचे चलती है.गरीबी वह चीज है जो शायद धरती के साथ ही प्रकट हुई.
इतिहास की किताब में यह तो है कि राजा ने सड़कें बनवाईं परंतु उन भिखारियों का कहीं जिक्र ही नहीं जो इन सड़कों से गुजरने वाले रथों तथा अश्वसवारों के पीछे भागते, रिरियाते हुए भीख मांगा करते थे ताकि वे गरीबी में उसी सड़क के किनारे पड़े भूखे न मर जाएं. इतिहास में यह तो दर्ज है कि राजा ने कुएं, बावड़ियां खुदवाईं परंतु यह कहीं भी नहीं बताया जाता कि उन कुओं में कूदकर कितने त्रस्त गरीबों ने आत्महत्या की?
तो क्या गरीब किसी की भी चिंता का विषय नहीं? वह कविता, कहानी, पेटिंग का ही विषय है? उससे भी क्या पता चल पाता है गरीबी के बारे में? मैंने ही अभी तक इस लेख में जो लिखा उससे आप गरीब के विषय में क्या जान सके? नहीं जान सके न?....यही होता है भाईसाहब. यह गरीब इतना रहस्यमय प्राणी है कि क्या कहें. सरकार भी इसका क्या तो करे? कोई भी क्या करे? गरीब और गरीबी पर केवल चिंता ही प्रकट की जा सकती है. वह तो हमने अभी की. खूब की. अब यह सनद रहे और प्रगतिशील इतिहास में लेखक का नाम भी दर्ज कराने में कभी काम आ जाए. तभी इस तरह के फालतू विषय पर लिखने का कोई मतलब बना भाईसाहब. है कि नहीं?गरीबी, अमीरी का विलोम कतई नहीं है. इसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व है. गरीब के दो हाथ भी होते हैं. ये हरदम खाली रहते हैं. गरीब के सिर पर एक अदद सूना आसमान तना रहता है, जिसमें उन तोतों के अलावा और कोई नहीं होता जो गरीब के हाथों से उड़े होते हैं. उसकी दो आंखें भी होती हैं. ये इतनी खाली होती हैं कि उनमें झांकने से भी डर लगता है. गरीब के दो कान भी होते हैं. उनसे उसे जमाने भर की लानतें तथा गालियां सुनने की ईश्वर प्रदत्त सुविधा मिली होती है. इस तरह, ऊपर से सरसरी तौर पर देखा जाए तो एक गरीब में भी वे सारे अंग होते हैं जो यह भ्रम खड़ा कर सकते हैं कि वह भी एक आदमी है. परंतु, जैसा कि हमने बताया ही कि मात्र इतने से ही कोई आदमी नहीं हो जाता. गरीब को आदमी बन पाने की फुरसत ही नहीं मिल पाती. गरीबी ही उसका पूरा समय ले लेती है. गरीबी एक 'फुल टाइम जॉब' है.
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