Wednesday, 24 April 2013

हमें भी जीने दो

                              
                                                      हमें भी जीने दो

 नाले के ऊपर मंडराता मच्छरों का झुंड. मंडराते हुए झुंड में तैरती उनकी आवाजें. तैरती आवाजों में कुछ आक्रोश के स्वर तो कुछ स्वर लाचारी के भी- ‘ऐसे कैसे चलेगा?’ ‘हमारी गर्भवती स्त्रियों का असमय ही गर्भपात हो जा रहा है, पोषण की कमी से.’ ‘पोषण! अरे एक वक्त ही पेट भर जाए तो गनीमत समझो!’ ‘हम दवाई-सवाई की प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं, मगर इस महामारी का क्या करें!’ ‘पहले हम हवा में उड़ते थे, अब हवा हमें उड़ा रही है.’ ‘सबके चेहरे पीले दिखते हैं.’ ‘हम सबमें खून की कमी हो गई है...’ ‘सृष्टि बनाने वाले ने भी कभी न सोचा होगा कि खून चूसने वाले मच्छरों के अंदर ही खून की कमी हो जाएगी.’ ‘कुछ तो करना ही होगा, भाइयों!’ ‘हर गली, हर नुक्कड़, हर मोहल्ले के अपने मच्छर भाइयों को बुलाइए’ ‘क्यों!’ ‘सारे एक जगह एकत्रित हो जाएं.’ ‘हम कूच करेंगे.’ ‘मगर कहां!’ ‘दिल्ली और कहां!’ ‘मगर हम दिल्ली जाकर करेंगे क्या?’ ‘चच्चा, आप तो हममें सबसे बुजुर्ग हैं, आप ही इसे समझाइए न!’ ‘बेटा, समझा तो दें, मगर तुम्हारी बात मैं खुद नहीं समझा हूं.’ ‘क्या चच्चा! इतने अनुभवी होकर भी आप ऐसी बात करते हैं! सारी बात मैं आपको रास्ते में समझा दूंगा.’ ‘ठीक है, शहर के सारे भाइयों तक यह संदेश पहुंच जाए कि कल यहां नाले पर सब आ जाएं.’
अगले दिन शहर के कोने-कोने से मच्छर नाले पर इकट्ठे हो गए. जितने मच्छरों की आमद की उम्मीद थी, उससे बहुत कम आए. कारण, कई तो भगवान को प्यारे हो गए और कई इतने अशक्त थे कि वे बेचारे यहां तक आ न सके. मच्छरों की महासभा हुई. महासभा में ‘दिल्ली चलो’ के प्रस्ताव को मंजूरी मिल गई. महासभा में एक-एक कर हृष्ट-पुष्ट मच्छरों को छांटा गया, ताकि वे दिल्ली तक की यात्रा कर सकें. हालांकि संख्या की दृष्टि से वे मुट्ठी भर थे.
...तो मच्छरों के प्रतिनिधियों का यह दल दिल्ली की ओर रवाना हो गया. इस समय दल वित्तमंत्री के बंगले के सामने है. वित्तमंत्री के बंगले के सामने पहुंचते ही...‘सत्ताधारी होश में आओ! होश में आओ!’ ‘हम सबको इतना मत सताओ!’ ‘मत सताओ!’ ‘मत सताओ!’ ‘दाम बांधो! दाम बांधो!’ ‘महंगाई कम करो!’ ‘कम करो!’ ‘कम करो!’ ‘हमें भी जीने दो!’ ‘जीने दो!’ ‘जीने दो!’ जब सारे मच्छर नारे लगा रहे थे, तभी दो स्थानीय नवजात मच्छर, जो भाई-भाई थे, आपस में बातें करने लगे. इस बात से अनजान कि उन दोनों की बातें दबे पांव उनकी माई भी सुन रही है.
‘ये लोग यहां क्यों आए हैं, भाई!’ ‘महंगाई कम करने के लिए शायद...’ ‘महंगाई... महंगाई रोकने की बात क्यों कर रहे हैं! ये भूल गए हैं क्या कि ये सब मच्छर हैं, कोई आम आदमी नहीं...’ ‘यही तो मैं भी नहीं समझ पा रहा हूं... भाई... भला महंगाई से हम मच्छरों का क्या कनेक्शन!’ तभी दोनों की माई दांत पीसती हुई आवेग में बोली, ‘कनेक्शन!!! बहुत कनेक्शन है!!!’ माई का यह रूप... यह अंदाज-ए-बयां देखकर दोनों सहम गए. माई तो ठहरी माई! अपने बच्चों की छिपी हुई भावनाओं को समझ ही लेती है. दोनों के सिर पर बड़े लाड़ से हाथ फेरते हुए माई बोली, ‘तुम दोनों अभी यही सोच रहे हो न कि महंगाई का हम मच्छरों से क्या कनेक्शन है?’ दोनों बच्चों ने अपने सिर सहमति से हिला दिए. माई बोली, ‘बेटा! हम दोनों ही आम आदमी का खून चूसते हैं...’  फिर रुक कर बोली, ‘अगर महंगाई ही आम आदमी का सब खून चूस लेगी, तो हम क्या चूसेंगे!’
 उधर वित्तमंत्री आवास के सामने महंगाई को लेकर धरना-प्रदर्शन चल रहा है. गगनभेदी नारे लग रहे हैं. पता नहीं, वित्तमंत्री को वे सुनाई देंगे या वे इसे मच्छरों की पिनपिनाहट मात्र ही समझेंगे. कह नहीं सकते...

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