Chalti ka naam gadi
On a rickety bus-ride between Jaipur and Delhi, Bhuwan Chandra, encounters real stories from a mini India.
३० नवम्बर २०१२ रात ११;३० चाँद अपने पुरे शबाब पे है| आज चाँद का रंग कुछ लाल है. वही दूसरी ओर चाँद को बस की खिड़की से तांक रहे अजीत सिंह कि आँखे भी उस चाँद से कम लाल नहीं हे.मेरे पूछे जाने पर उसने बताया बड़े भाई को झूटे मर्डर केस में फसाया गया है. और वो केस की तारीख से वापस आ रहा है. वही दूसरी ओर पीछे वाली सीट पर एक प्रेमी युगल बैठा है.प्रेमी जो लोगो से आँखे बचा कर हाशमी बनने की कोशिश कर रहा है. और प्रेमिका इतराते हुए उसके बाहों में सिमट रहे है .
कुछ बुज़ुर्ग लोगो का कहना है.की लव शव तो मोबाइल की देन, तो कुछ लोगो का मानना है की १६ साल में लड़की की शादी कर दो . क्योंकि वो कहते है की आजकल फीमेल हॉर्मोन जल्दी बनने लगे है, तो क्या शादी सिर्फ और सिर्फ शारीरिक सम्बन्ध बनाना है . या कुछ और जिम्मेदारिया भी निभानी पड़ती है? बस का ड्राईवर तेजप्रकाश भी शायद इस प्रेमी युगल को देख रहा है ,और सिचुएशन के हिसाब से बिलकुल फिट और हिट दो दिल मिल रहे है , टेप रिकॉर्डर पर बजा रहा है. ड्राईवर, अपने नाम को सही सिद्ध करता हुआ बस को लगातार ६० से ८० किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से चला रहा है . मुसाफिर हु यारो, न घर है न ठिकाना जैसागाना बजiता है. वही लाल आँखों वाला अजीत सिंह, जो पेशे से कारपेंटर है,बता रहा है की भाई के जेल जाने के बाद एक बड़े परिवार की जिम्मेदारी उसके सर पे आ रहे है और इतने महंगाई में घर चलाना बड़ा मुश्किल है. वो भारत के कानून को गाली देते हुआ कहता है की पुलिस नेता, चोर भी एक दुसरे से जुड़े हुए है.
हम जयपुर से डेल्ही यात्रा पर है, बस नीम बाड़ी पहुंचकर कुछ देर के लिए रुकी बस का नंबर है HR २९५२ बस पर लिखा है , हरयाणा सरकार ने ७८.८३ लाख गरीब परिवारों को दो रुपये किलो के हिसाब से चावल मुहय्या कराया और २८५ करोड़ की सबसीडी, तो क्या हरयाणा सरकार ने ये सब अपनी जेब से दिया है ,या जनता ही का पैसा जनता को दिया है ?
बस फिर चल पड़ी, मै कुछ सवालों के साथ वापस बस में बैठा और सोच में गुम हो गया, आधी रात को बस मानेसर के पास में रुकी और लगभग दस से पंद्रह मजदूर बस में चढ़ आए, कंडक्टर साहब ने १२ रुपये की टिकट के बजाय हरएक से १० रुप्ये में बात पक्की कर ली, मेरी आँखों के सामने करप्शन हो रहा था. कुछ कवियों ने इंसान को घोडा कहा है यह कथन मुझे उस वक्त सही लगा जब मैंने देखा कई मजदूर घोड़े के समान खड़े-खड़े ही सो गए. ये लोग घोर परिश्रम करके लोट रहे हैं, और दूसरी तरफ कुछ व्यवसायी काला बाजारी करते हुए मुंबई में गगनचुंबी इमारतों में खर्राटे भर रहे हैं. मैं इसी ख्याल में खोया हुआ था. जब कंडक्टर ने आवाज दी इफ्फको चौक ! मैं जल्दी से बस से नीचे उतर आया, लेकिन मन में कई सवाल अंगड़ाइया ले रहे रैं, क्या कभी उस प्रेमी युगल को मंजिल मिल पायेगी. और अजीत सिंह का क्या होगा? ये थी एक बस की कहानी ऐसी लाखों बसें भारत में रोज़ाना चलती हैं... ज़रा सोचिये..
No comments:
Post a Comment