Thursday, 4 June 2015

 मां अब भी यही समझती है
मैं अंगुली पकड़कर स्कूल जाता हुआ बच्चा हूं
मां को नहीं दिखते मेरी कनपटी के सफेद बाल
चेहरे पर बढ़ते हुए सल
जब भी आता है गांव से मां का पत्र
हिदायतों की बरसात कर जाता है
मैं तरबतर हो जाता हूं 
नासपीटा बड़ा होकर कौन देस जाकर रहेगा अपनी जैसी जोरू के साथ
तिरालीस की उमर में अपने हाथ से बेली-सिकी रोटी खाते हुए
चट्टी अंगुली को अपनी ओर देख पांच सौ मील दूर गांव में
मां के अंतिम स्थान को याद करते हुए आंसुओं से भीग जाता हूं
भरी बरसात में पिता के दिए घर में निपट अकेला.

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