मां अब भी यही समझती है
मैं अंगुली पकड़कर स्कूल जाता हुआ बच्चा हूं
मां को नहीं दिखते मेरी कनपटी के सफेद बाल
चेहरे पर बढ़ते हुए सल
जब भी आता है गांव से मां का पत्र
हिदायतों की बरसात कर जाता है
मैं तरबतर हो जाता हूं
नासपीटा बड़ा होकर कौन देस जाकर रहेगा अपनी जैसी जोरू के साथ
तिरालीस की उमर में अपने हाथ से बेली-सिकी रोटी खाते हुए
चट्टी अंगुली को अपनी ओर देख पांच सौ मील दूर गांव में
मां के अंतिम स्थान को याद करते हुए आंसुओं से भीग जाता हूं
भरी बरसात में पिता के दिए घर में निपट अकेला.
मैं अंगुली पकड़कर स्कूल जाता हुआ बच्चा हूं
मां को नहीं दिखते मेरी कनपटी के सफेद बाल
चेहरे पर बढ़ते हुए सल
जब भी आता है गांव से मां का पत्र
हिदायतों की बरसात कर जाता है
मैं तरबतर हो जाता हूं
नासपीटा बड़ा होकर कौन देस जाकर रहेगा अपनी जैसी जोरू के साथ
तिरालीस की उमर में अपने हाथ से बेली-सिकी रोटी खाते हुए
चट्टी अंगुली को अपनी ओर देख पांच सौ मील दूर गांव में
मां के अंतिम स्थान को याद करते हुए आंसुओं से भीग जाता हूं
भरी बरसात में पिता के दिए घर में निपट अकेला.
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